चाहता हूँ...

ख्वातिनों हज़रात एक इकबाले जुर्म करना चाहता हूँ...
भरी महफ़िल में मैं अकेले किसी का दीदार करना चाहता हूँ।
मैं कुछ कहूँ तो ऐतराज़ न हो बस ये इल्तेजा है...
की बंदा मैं मोहब्बत फिर एक बार करना चाहता हूँ।

अफसोस न हो ना कह पाया, उनसे, जो हाले दिल था..
खुदसे करना रोज़ शिकायत, वो दौर अजब मुश्किल था।
ना जाने क्या क्या सोचा, क़ि उनसे मिलकर बोलेंगे...
आज रुबरूं बैठे हैं वो,जिनको माना हासिल था।

उनके चेहरे का भोलापन,वो बेबाक नयन दो पागल
घिर आती शाम की जब भी लहराता उसका आँचल
उसकी बोलि उस्की बातें, उसका काजल काला
उसकी आँखों में खो जाता मैं जैसे बिरहा का बादल।

उन बेतरतीब निगाहों को जबसे देखा, चाहता हूँ
दिल ही दिल में की मोहब्बत,इसकी सज़ा चाहता हूँ
मैं कुछ कहूँ तो ऐतराज़ न हो बस ये इल्तेजा है
कि बाँदा मैं मोहब्बत फिर एक बार करना चाहता हूँ।

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