केहते हैं ऊपर वाले ने
जब माँ बाप बनाए थे
अपनी जगह धरा पे उसने
अपने अंश जनाए थे।
है मात पिता की क्या उपमा
ये पूज्य प्रभू से होते हैं
जो भगवन इनमें बसते है
ये पात्र अनोखे होते हैं।
बाबूजी की ऊँगली धरकर
मैने जग सागर पार किया
अम्मा की छाती लगकर मैंने
जीवन का आहार किया।
आचारों में सु-सभ्य बना
थी बाबूजी की सीख सदा
पर पीड़ा का न नीड़ बना
अम्मा से सीख प्रियम वदा।
जिज्ञासा और सूझ बुझ को
बाबू जी ने पनपाया
अहं, क्रोध, औ लालच से
बचना अम्मा ने सिखलाया।
आगे बढ़ना, गिरकर उठना
बाबूजी से सीख सका
आदर, प्रेम, स्नेह पाया
अम्मा के आँचल तले ढका।
बाबूजी की सहछाया में
बोली सीखी, व्यवहार मिला
अम्मा की मनोकथाओं
सही गलत का बोध मिला।
मूल मिला, अभिप्राय मिला
अम्मा बाबूजी के कारण
एक सपने को इक रूप मिला
अम्मा बाबूजी के कारण।
जब माँ बाप बनाए थे
अपनी जगह धरा पे उसने
अपने अंश जनाए थे।
है मात पिता की क्या उपमा
ये पूज्य प्रभू से होते हैं
जो भगवन इनमें बसते है
ये पात्र अनोखे होते हैं।
बाबूजी की ऊँगली धरकर
मैने जग सागर पार किया
अम्मा की छाती लगकर मैंने
जीवन का आहार किया।
आचारों में सु-सभ्य बना
थी बाबूजी की सीख सदा
पर पीड़ा का न नीड़ बना
अम्मा से सीख प्रियम वदा।
जिज्ञासा और सूझ बुझ को
बाबू जी ने पनपाया
अहं, क्रोध, औ लालच से
बचना अम्मा ने सिखलाया।
आगे बढ़ना, गिरकर उठना
बाबूजी से सीख सका
आदर, प्रेम, स्नेह पाया
अम्मा के आँचल तले ढका।
बाबूजी की सहछाया में
बोली सीखी, व्यवहार मिला
अम्मा की मनोकथाओं
सही गलत का बोध मिला।
मूल मिला, अभिप्राय मिला
अम्मा बाबूजी के कारण
एक सपने को इक रूप मिला
अम्मा बाबूजी के कारण।
Very well written... Must say good choice of words
ReplyDeleteNice one...
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